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Friday, 29 January 2016

बेटी हुँ मैं, एक अंश तुम्हारा

बेटी हुँ मैं, एक अंश तुम्हारा
बोझ नही मैं, मैं बनूँगी सहारा

माँ, तुम तो सब समझती हो
तुम भी तो एक बेटी हो
फिर क्यों तुम कभी-कभी
मुझको बोझ कहती हो

मुझको जन्म तो लेने दो
कुछ गलतिया तो करने दो
आपके इस सुने आँगन में, नाजुक कली सी खिलुंगी मैं
जैसे मुझे समझाओगे, बस उन्ही रास्तो पे चलूंगी मैं
बेटी हुँ मैं, एक अंश तुम्हारा
बोझ नही मैं, मैं बनूँगी सहारा
पिताजी,आपके सब संस्कारो का मैं मान करुँगी
पराये घर में भी आपका अभिमान बनूँगी
एक बार ऊँगली पकड़ के चलना तो सिखाओ
फिर आपके हर सपने में, मैं भी रंग भरुंगी

बेटी हुँ मैं, एक अंश तुम्हारा
बोझ नही मैं, मैं बनूँगी सहारा

Thursday, 12 March 2015

मेरी माँ

सबसे प्यारी है मेरी माँ
परियो की कहानियो की परी है मेरी माँ
चांदनी सी शीतल है मेरी माँ
मेरे अकेलेपन का साथ है मेरी माँ
जो मै हु तो उसकी वजह है मेरी माँ

एक दर्द है,एक मीत है
एक सुनहरा सपना, एक प्यारा सा गीत है

मेरी माँ की कहानी
कुछ उनकहे श्ब्दों सी है
कुछ उनकहे किस्सों सी है
फिर भी ना जाने क्यों सभी ने सुनी सी है

मेरी माँ
गोद में सुला कर लोरिया सुनती है
कभी राजा-रानी तो कभी अपनी कहानी बताती है
मेरी हर राह में फूल बिछाती है
मेरी हर छोटी सी खुसी में बागो सी खिल जाती है

हाथ थाम कर चलना सिखाया
मेरे सपनो के पंख लगा कर मुझे उड़ाया
चलते-चलते राहो में जब भी मै थक जाता हु
मेरी माँ क आँचल के छाँव को मै वहां पाता हु

मेरी हर गलती पे मुझे डांटा करती है
मेरे सहम जाने पर गले से लगाया करती है
सब दर्द भूल जाता हु जब माँ गले से लगाती है
सब बात सिख जाता हु जब माँ मुझे सिखाती है
खुद के दुखो को छुपाती है मेरे भी समेटना चाहती है
मेरे जीवन के आँगन में हर खुशियाँ भरना चाहती है

इन उलझे से रिस्तो में एक सुलझा रिस्ता दिखता है
इसीलिए तो छोटा बच्चा भी माँ का प्यार समझता है
मंदिर- मस्जिद क्यों जाऊ मै
जब हर भगवान मेरी माँ में दिखता है

इंसान ने धर्म और जात बनाये
फिर भी माँ को बाँट ना पाये
कितने ज्ञानी पंडित आये
फिर भी माँ के प्यार की भाषा समझ ना पाये

उसका प्यार दिखावा नही इसमें सब कुछ सच्चा है
माँ की ममता सबके लिए एक समान, वही प्यार की परिभाषा है
माँ की महिमा ना बता सकूंगा
सब्दो में ना बयां कर सकूंगा
अब भी थमने को जी नही चाहता
शायद मै माँ के बारे में कुछ और बताता


Tuesday, 18 February 2014

आज मेरी कविता मुझसे नराज है

आज मेरी कविता मुझसे नराज है डर है उसे, लिख कर भुल गया हूँ मैं । वो कहती है, एक तुम ही तो हो जिसके संग खिलखिलाकर हँस लेती हूँ । कभी एक दुल्हन कि तरह सज लेती हूँ । पर जब तुम ही नहीं करोगे बातें मुझसे तो क्यों मैं बैठु रोज ऐसे सजसवर के । वो कहती है,याद है तुम्हे, कभी एक दर्द तुम्हारा छुपा लिया था । तो कभी एक ख़ुशी मे हमने ईद और दीवाली मना ली थी । और जब रात का अंधेरा बाँटा हमने आधा-आधा फिर क्यों मुझे धुप कम छाँव ज्यादा। अब क्या बताऊ उसे किन उल्जनो मे फसा हूँ मैं । कैसे उसके बिना, दुखों मे भी हँसा हूँ मैं । वक़्त कि रफ़्तार मे खो गया हूँ मैं । ऐसा नहीं है, कि उसे भूल कर सो गया हूँ मैं । इस दौड़ती जिंदगी से एक पल चुरा कर उसे दे देने को जी चाहता है । इंद्र धनुष से रंग उधार मांग कर उसके संग रंगोली बनाने को जी चाहता है । बारिश कि इन बूंदो मे उसके संग एक बार फिर से पागलो सा नाचने को जी चाहता है । ये सब बातें सुना कर आज उसे फिर से मनाने को जी चाहता है ।